परंपरा से आगे — अब वैज्ञानिक दृष्टि की बारी है!
गोग्रास, गोधन और गोगव्य का राष्ट्रीय महत्व**
भारत में सदियों से गौमाता को पोषण, स्वास्थ्य, कृषि और आध्यात्मिक जीवन का केंद्र माना गया है। परंपरा ने हमेशा गौमाता को माँ की तरह सम्मान दिया, लेकिन आज का दौर केवल भावनाओं से नहीं चलता—अब आवश्यकता है कि हम वैज्ञानिक दृष्टि से गोग्रास और गोगव्य (गौ-उत्पादों) के महत्व को समझें।
इसी संदेश को मजबूत करने के लिए गौ सम्मान आह्वान अभियान देशभर में गोगव्य संरक्षण, अनुसंधान और नीतिगत समर्थन को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का कार्य कर रहा है। अभियान का उद्देश्य केवल धार्मिक सम्मान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित राष्ट्रीय नीति तैयार करवाना है, ताकि गौमाता और उससे जुड़ी सम्पूर्ण पारंपरिक अर्थव्यवस्था को संरक्षित किया जा सके।
गोगव्य के वैज्ञानिक एवं आर्थिक महत्व के प्रमुख बिंदु
1. गोबर और गोमूत्र — कृषि एवं पर्यावरण की जीवनरेखा
प्राचीन भारत में खेती का आधार गोबर और गोमूत्र था, जिसे आधुनिक विज्ञान भी आज सबसे सुरक्षित, प्राकृतिक और मिट्टी को पुनर्जीवित करने वाला पदार्थ मानता है।
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गोबर से बनी खाद (Vermi Compost) मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को सक्रिय करती है।
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गोमूत्र में पाए जाने वाले एंटीबैक्टीरियल गुण खेती में रासायनिक दवाओं की जगह ले सकते हैं।
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कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार गोबर का उपयोग मिट्टी को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की प्राकृतिक पूर्ति करता है।
इसलिए अभियान मांग करता है कि गोगव्य अनुसंधान को विश्वविद्यालयों में बढ़ावा दिया जाए और इसे कृषि, आयुर्वेद एवं पर्यावरण अध्ययन का मुख्य हिस्सा बनाया जाए।
2. दूध, दही, घी — केवल भोजन नहीं, आयुर्वेदिक औषधि
भारतीय भोजन शास्त्र कहता है कि इन पाँच अमृतों —
दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र —
से व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता बढ़ती है।
आयुर्वेद में इन्हें ओज, बल और रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला माना गया है।
घी में पाए जाने वाले फैटी-एसिड हृदय, मस्तिष्क और पाचन तंत्र के लिए लाभदायक हैं।
दही से शरीर में प्रीबायोटिक तत्व बढ़ते हैं।
गौमूत्र में 24 से अधिक औषधीय तत्व पाए जाते हैं, जिनका उपयोग कई दवाओं में होता है।
इसीलिए अभियान यह मांग कर रहा है कि इन अमूल्य उत्पादों को “राष्ट्रीय पोषक-संपदा” घोषित किया जाए और इनके संरक्षण के लिए सरकार स्पष्ट नीतियाँ बनाए।
गोग्रास और गोगव्य — भारत की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने की शक्ति
आज देश में लाखों गौ-वंश सड़क पर या बेसहारा घूम रहे हैं। यदि गोगव्य आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जाए—
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गोबर आधारित बिजली और गैस प्लांट,
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जैविक खेती,
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आयुर्वेदिक औषधियाँ,
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देसी नस्लों के संरक्षण केंद्र,
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गोगमय उत्पादों की राष्ट्रीय मार्केट—
तो ग्रामीण भारत में लाखों युवाओं को रोजगार मिल सकता है।
यह अभियान इसी सोच को राष्ट्रीय स्तर पर ले जा रहा है—कि गौ माता की रक्षा केवल परंपरा नहीं, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था बचाने की कुंजी है।
निष्कर्ष — परंपरा, विज्ञान और नीति का संगम ही भारत का भविष्य
गौ सम्मान आह्वान अभियान केवल भावनात्मक आह्वान नहीं, बल्कि यह वैज्ञानिक, आर्थिक और सामाजिक बदलाव का राष्ट्रीय आंदोलन है।
इसका लक्ष्य है—
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गोगव्य पर शोध,
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देसी नस्लों का संरक्षण,
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गौ आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा,
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और इन सभी बिंदुओं के लिए मजबूत सरकारी नीति।
यदि भारत को सतत कृषि, स्वस्थ समाज और पर्यावरण-संतुलन की ओर बढ़ना है, तो गोगव्य संरक्षण केवल विकल्प नहीं—आवश्यकता है।
